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Sunday, July 6, 2025

स्वतंत्रता दिवस -15 अगस्त हिंदी निबंध

 स्वतंत्रता दिवस - 15 अगस्त


'पराधीन सपनेहूं सुख नाहि।' यह उक्ति स्वतंत्रता के मूल्य को दर्शाती है और महत्व को भी, यानि भारत लगभग 150 वर्षों तक गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। इस कारण आजादी का मूल्य भारतवासी समझते हैं।


भारत में जिस तरह सामाजिक व धार्मिक पर्व (त्योहार) हार्दिक उल्लास से मनाए जाते हैं, वैसे ही स्वाधीनता दिवस भी हर्षोल्लास से मनाया जाता है। स्वाधीनता दिवस हमारा राष्ट्रीय पर्व है, जो 15 अगस्त को बड़ी उमंग और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इसी दिन हमारा देश विदेशी शासन से


आजाद हुआ था और अंग्रेज देश के शासन की बागडोर हमारे सुपुर्द कर भारत छोड़कर अपने वतन लौट गए थे। अतः हम सभी इस दिन को ऐतिहासिक दिवस के रूप में मनाते हैं।

स्वतंत्रता दिवस का हम सबके लिए अत्यधिक महत्व है। क्योंकि देश को स्वतंत्र कराने के लिए हमारे देश के हजारों वीर जवानों ने अपना जीवन उत्सर्ग किया था। अनेक नेताओं ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए जेलों में अमानवीय यातनाएं भोगी थीं। वे उन भीषण यातनाओं से विचलित नहीं हुए, बल्कि अधिक संकल्पवान हो उठे थे। अंततः कड़ी मेहनत व बलिदानों के पश्चात् 15 अगस्त 1947 को हमारा देश स्वाधीन हो पाया।


स्वाधीनता दिवस सभी स्तर यथा राष्ट्रीय, प्रांतीय व स्थानीय स्तर पर बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर भारत की राजधानी दिल्ली में प्रधानमंत्री 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा फहराते हैं तथा देश के नाम संदेश प्रसारित करते हैं। दूसरे राज्यों की राजधानी में भी स्वाधीनता दिवस बड़े हर्ष के साथ मनाया जाता है। राज्यों के मुख्यमंत्री प्रजा को संबोधित करते हैं और प्रदेश की प्रगति की योजनाओं से प्रजा को परिचित कराते हैं। छोटे-बड़े सभी राज्यों एवं शहरों में इस दिन अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम भी

होते हैं, जिसमें ध्वजारोहण, राष्ट्रगान व उत्साहवर्धक वक्तव्य विशिष्ट होते


प्रत्येक विद्यालय में भी स्वाधीनता दिवस बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। विद्यार्थी प्रात:काल 7 बजे विद्यालय के प्रांगण में एकत्रित हो जाते हैं। फिर प्राचार्य और दूसरे अध्यापक उपस्थित होते हैं। राष्ट्रगान के साथ उत्सव शुरू होता है और प्राचार्य तिरंगा झंडा फहराते हैं। उसके बाद एक-एक करके विद्यार्थी देशभक्ति के गीत गाते हैं, फिर अध्यापकगण और प्राचार्य भाषण देते हैं और छात्रों को स्वतंत्रता दिवस का महत्व समझाया जाता है ताकि स्वाधीनता अक्षुण्ण रहे।


इस तरह स्वाधीनता दिवस संपूर्ण देश में धूमधाम से मनाया जाता है। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि इस दिन हमें अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति प्राप्त हुई थी। देश की स्वतंत्रता के लिए हमारे नौसेनिकों ने भारी कीमत चुकाई थीं, अतः हमें अपनी आजादी की सभी प्रकार से रक्षा करना चाहिए और वक्त आने पर भारत की एकता, अखंडता व रक्षा के लिए जीवन न्यौछावर कर देने के लिए भी तत्पर रहना चाहिए। अपने देश के लिए हम सबका यही परम कर्तव्य है कि हम अपने स्वर्गीय स्वतंत्रता सेनानियों के प्रत्येक स्वप्न की पूर्ति करने का प्रयास करें और उनकी कुर्बानियों को सार्थक करें।

Tuesday, October 29, 2024

10 lines short hindi essays on the topics in daily life

भूकंप 

भूकंप याने धरती कंप होना , धरती थरथरना आपके पाँवो के निचे धरती हिलना , या फिसल जाने जैसा लगना, उसी से गिर जाना , इमारतों का अचानक गिरना ।इसलिए आदमी घबरा जाता हैं ।

भूकंप अचानक होने के कारन भूकंप के समय आप आपने काम में , या घर में , या नींद में रहते हो। भूकंप का दोष किसी को भी नहीं दिया जा सकता और उसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। 

महाराष्ट्र और देश के भूकंप शास्त्रीय दृष्टि से समतोल  सखोल सर्वेक्षण करके जिलेवाइज नक्षा प्रसिद्द करके और उनकी जानकारी शिक्षण में समाविष्ट करने से व्यवहार से  उपयोगी होगी। विद्यार्थियों को इसका प्रशिक्षण देकर भावी संकट के दृष्टिसे अत्यावश्यक होगा। 

सायकिल 

सायकिल पर सवार होकर घुमने में मुझे  बहुत आनंद होता है । मैं  अच्छी  तरह से सायकिल चलाता हूँ । परन्तु भिड में अत्यन्त धीरे सायकिल चलाता हूँ ।

    आज के गतिमान युग में सायकिल मनुष्य की साथी है। कोई भी दूर दराज का काम थोड़े ही समय में पूरे किये जाते है। 

छोटे उद्योग धंदे करनेवालों को सायकिल बहुत उपयोगी पड़ती हैं। बहुत से प्रवासी लम्बा सफर सायकिल पर ही करते हैं।

सायकिल हर रोज साफ करनी चाहिए। उसकी निगा रखनी चाहिए ।सभी को सायकिल दुरुस्त करना आना चाहिए ।सायकिल वाहतुक के नियम पालकर चलाना चाहिए ।सभी लडके - लडकियों को सायकिल चलाना सिखना चाहिए। सायकिल से शरीर का व्यायाम होता है। 

सायकिल गरीबों का वाहन हैं ।


घड़ी 

  आज का सारा युग घड़ी से चल रहा है। सभी कामों का समय निश्चित होता है । समय से ही समय पर काम करना निसर्ग का नियम है। इसलिए मानव जीवन में घड़ी का महत्व दिया है ।


घड़ियाँ अनेक प्रकार की और आकार की होती है। दीवार पर टँगनेवाले , मनोरे पर लगा देने की , हाथ में बांधने की, जेब में रखनेवाली , मेज पर रखनेवाली आदि। घड़ी समय दिखाती है, फिर वह गजर करने से नींद से जगाती है। जग में अनेक नमूने की घड़ियाँ हैं ।

आदमी घड़ी को देखकर चलता है ।पहला काम समय पर नहीं हुआ तो आगे के सभी कामों में बाधा आती है। सब कामकाज समय पर होना चाहिए ।घड़ी ये भूषण ही नहीं तो उपयोगी चीज भी हैं । इसलिए  सभी को घड़ी की आवश्यकता होती है ।

सभी ने घड़ी के साथ चलना चाहिए ।



Wednesday, October 16, 2024

मेरा प्रिय त्योहार दीपावली



मेरा प्रिय त्योहार : 

दीपावली


          हिंदू त्योहारों में दीपावली का महत्व और जनप्रियता सर्वाधिक है। कार्तिक माह की अमावस्या के दिन आने वाला यह पर्व अनगिनत मोमबत्तियों, रंगीन बल्बों और दीपमालाओं से अमावस्या के घोर अंधेरे को शरद् पूर्णिमा में बदल देता है।इनके प्रकाश के समक्ष आकाश के असंख्य तारे भी फीके पड़ जाते हैं। दीपों के इस पर्व को किसी न किसी रूप में देश के लगभग सभी लोग मनाते हैं। या के राज्यों के लोग इस त्योहार का आनंद प्राप्त करते हैं। इस त्योहार के साथ कई पौराणिक और दंतकथाएं कही जाती हैं। माना जाता है कि धर्मराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ की समाप्ति भी इसी दिन हुई थी। ऐसी भी मान्यता है कि श्री राम 14 वर्ष के वनवास के पश्चात् सीताजी व लक्ष्मण के साथ इसी दिन अयोध्या लौटे थे। उनके स्वागत हेतु अयोध्यावासियों ने अयोध्या को विभिन्न प्रकार से सजाया व रोशन किया था। घरों में मिठाइयां बंटी थीं। तभी से यह त्योहार हर्ष, उल्लास व विजय का पर्याय बन गया। क्योंकि इसकी पृष्ठभूमि में श्री राम की लंका विजय की ओजस्वी कथा भी जुड़ी है।


पौराणिक कथानक के अनुसार, सागर मंथन होने पर आज ही के दिन देवी लक्ष्मी जी का आविर्भाव (जन्म) हुआ था। अतः इस दिन लक्ष्मी जी की पूजा भी की जाती है। लोग पूरी रात लक्ष्मी के आगमन की आशा में घरों के द्वार खुले रखते हैं। व्यापारी वर्ग इस दिन को अत्यंत पवित्र मानते हैं और अपने गत वर्ष का हिसाब-किताब साफ करके नए बही-खाते सृजित करने का कार्य करते हैं। आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद सरस्वती का निर्वाण भी इसी दिन हुआ था। अतः आर्य प्रवर्तक इस त्योहार को बहुत पवित्र मानते हैं। इसी तरह जैनियों के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी का निर्वाण भी इसी दिन को हुआ था। अतः सारा जैन समाज दीपावली के इस त्योहार को संपूर्ण श्रद्धा से मनाता है।


दीपावली से कुछ दिन पूर्व घरों, दुकानों व कार्यालयों में नए सिरे से रंग- रोगन व साफ-सफाई की जाती है। इससे मच्छरों व गंदगी का नाश भी हो जाता है और प्रत्येक स्थान चमकदार नजर आने लगता है। बाजार भी दमकने लगते हैं। इस तरह दीपावली का त्योहार स्वच्छता का प्रतीक बन गया है। दीपावली पर शाम के समय संपूर्ण नगर दीपकों के प्रकाश से जगमग करने लगता है। मिठाइयां, खिलौनों व पटाखों की दुकानों पर भीड़ उमड़ आती है। इस पर्व पर लोग शुभकामनाओं के साथ अपने मित्रों व रिश्तेदारों के यहां मिष्ठान आदि भिजवाते हैं और आपसी वैमनस्य भूलकर जीवन को संपन्न बनाने का प्रयत्न करते हैं।


इस तरह देश व मानव जाति की समृद्धि का यह त्योहार बहुत उत्साहवर्धकव महत्त्वपूर्ण है। अब यह त्योहार सिर्फ भारत में ही नहीं, विदेशों में भी मनाया जाता है। हिंदू समाज की संस्कृति में दीपावली को सर्वाधिक महत्व प्रदान किया गया है। इस पर्व का प्रत्येक हिंदू अधीरता से प्रतीक्षा करता है।





Friday, October 4, 2024

विजयादशमी (विजया दशमी)दशहरा (विजया दशमी)




 विजयादशमी दशहरा (विजया दशमी)

              दशहरा भी हिंदुओं का मुख्य त्योहार है। दशहरा आश्विन मास की दसवीं तिथि को मनाया जाता है। इस मास में गुलाबी ठंड का आगमन हो जाता है। यह माह अत्यंत मनोरम होता है। इस माह में न तो ज्यादा गर्मी होती है और न ही ज्यादा सर्दी पड़ती है।


             दशहरे से दस दिन पूर्व रामलीलाओं का आयोजन किया जाता है। दशहरे का महत्व रामलीलाओं के कारण बढ़ जाता है। भारत के प्रत्येक शहर एवं गांव में रामलीला का आयोजन होता है। दिल्ली में तो सभी कॉलोनियों में रामलीला होती हैं। किंतु दिल्ली गेट के करीब रामलीला मैदान की रामलीला सर्वाधिक प्रसिद्ध है। वहां पर दशहरे वाले दिन प्रधानमंत्री स्वयं रामलीला देखने आते हैं। उनके साथ दूसरे मंत्रीगण और अधिकारी भी होते हैं। उनके अतिरिक्त वहां हजारों लोगों की भीड़ होती है।


समाज के सभी वर्ग के लोग रामलीला देखने आते हैं। इसमें वे प्राचीन संस्कृति के साथ अपना जुड़ाव दर्शाते हैं।


दशहरे के दिन मनोरंजक मेले का आयोजन भी होता है। उस दिन रावण, कुम्भकर्ण और मेघनाद के पुतले प्रज्ज्वलित किए जाते हैं। सच है कि ज्यादातर लोग तो इन्हीं पुतलों को देखने आते हैं। रामलीला के अतिरिक्त दशहरे के दिन आतिशबाजी दर्शनीय होती है जो दर्शकों का मन आकर्षित करती है। अनेक नगरों में तो आतिशबाजी की प्रतियोगिता भी होती है जिनमें आगरा नगर एक है। वहां पर कई नगरों से आतिशबाज आते हैं और जिसकी आतिशबाजी सर्वश्रेष्ठ होती है उसे पारितोषिक दिया जाता है। आतिशबाजी कार्यक्रम के बाद रामचंद्र जी रावण का संहार करते हैं। फिर बारी-बारी से पुतलों में अग्नि लगाई जाती है। प्रथमतः कुंभकर्ण का पुतला जलाया जाता है। उसके पश्चात् मेघनाद के पुतले में अग्नि लगाई जाती है और सबसे अंत में रावण के पुतले में अग्नि दी जाती है।


रावण का पुतला सबसे बड़ा बनता है। उसके दस सिर होते हैं, उसके दोनों हाथों में तलवार तथा ढाल होती हैं। रावण के पुतले को श्रीराम अग्निबाण से जलाते हैं। रावण के पुतले में अग्नि लगने के बाद सभी दर्शक अपने-अपने घरों को लौटने आरंभ हो जाते हैं।

भारतीय हिंदू समाज में दशहरे का दिन बहुत शुभ दिन माना जाता है। इस दिन श्रमिक लोग अपने-अपने काम के यंत्रों की पूजा करते हैं। वे लड्डू बांटकर प्रसन्नता प्रदर्शित करते हैं।

दशहरे का त्योहार असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई की विजय भी कहा जाता है। इस दिन श्री राम ने बुराई के प्रतीक रावण का संहार किया था। अतः हमें भी अपनी बुराइयों को त्यागकर अच्छाइयों को स्वीकार करना चाहिए, तभी इस दिन की वास्तविक महिमा व गरिमा स्थापित हो सकती है।

Sunday, December 4, 2022

स्वामी विवेकानंदपर हिन्दी निबंध

  स्वामी विवेकानंद


विश्व के महान आध्यात्म पुरुषों में स्वामी विवेकानंद को भी सम्मिलित किया जाता है ? स्वामी विवेकानंद के बाल्यकाल का नाम नरेंद्र था, किंतु अखिल विश्व में वह स्वामी विवेकानंद के नाम से जाने जाते हैं। स्वामी विवेकानंद का जन्म 1863 में हुआ था। उन्होंने अंग्रेजी विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की व 1884 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। उनमें आध्यात्मिक चेतना बहुत तीव्र थी, अतः वह 'ब्रह्म समाज' के अनुयायी हो गए। उन दिनों स्वामी विवेकानंद जब सत्य की तलाश में यत्र-तत्र भटक रहे थे तब उनकी भेंट रामकृष्ण परमहंस से हुई। फिर उन्होंने रामकृष्ण परमहंस को अपना गुरु बना लिया। परमहंस जी की वाणी में अलौकिक आकर्षण शक्ति थी, जिसने स्वामी विवेकानंद को अपने प्रभाव में कर लिया और वे उनके भक्त बन गए।


नरेंद्र की मां की अभिलाषा थी कि वह वकील बने व विवाह करके गृहस्थ धर्म निभाएं, किंतु जब वे रामकृष्ण परमहंस के प्रभाव में आए, तो उन्होंने संन्यास ले लिया। अध्यात्म ज्ञान की प्राप्ति के लिए वे हिमालय चले गए। सत्य की तलाश में नाना प्रकार के कष्ट झेले। फिर हिमालय से उतरकर उन्होंने संपूर्ण देश का भ्रमण किया। लोगों को धर्म व नीति का उपदेश दिया। इस प्रकार धीरे-धीरे उनके विचारों से लोग जुड़ने लगे।


उन्हीं दिनों स्वामी विवेकानंद को अमेरिका में होने वाले 'सर्वधर्म सम्मेलन' की सूचना मिली। वे तत्काल उसमें सम्मिलित होने को तैयार हो गए और भक्त मंडली की मदद से वे अमेरिका पहुंच गए। वहां पहुंचकर उन्होंने ऐसा पांडित्यपूर्ण, ओजस्वी व धाराप्रवाह संबोधन दिया कि श्रोता चमत्कृत रह गए।


स्वामी विवेकानंद ने पश्चिम वालों को कहा कि 'कर्म को सिर्फ कर्तव्य समझकर करना चाहिए। उसमें फल की इच्छा नहीं रखनी चाहिए।' यह बात उनके लिए सर्वथा नई थी। स्वामी विवेकानंद के वक्तव्य की प्रशंसा वहां के समाचार-पत्रों में होने लगी। उनकी वाणी में ऐसा कुछ था कि श्रोता उसमें खो जाया करते थे।


स्वामी जी अमेरिका में तीन वर्ष रहे और वहां वेदांत का प्रसार करते रहे । इसके बाद वे इंग्लैंड चले गए। वहां भी वे एक वर्ष रहे। वहां उनके वेदांत ज्ञान से प्रभावित होकर कई अंग्रेज उनके शिष्य बने और उनके साथ ही भारत भूमि पर आ गए।


स्वामी विवेकानंद का रूप अत्यंत ही सुंदर एवं तेजस्वी था। उनका शरीर 'बलिष्ठ था। उनके चेहरे पर आभा थी। उनका स्वभाव अत्यंत सरल व व्यवहार अति विनम्र था। वे अंग्रेजी के अतिरिक्त संस्कृत, जर्मन, हिब्रू, ग्रीक व फ्रेंच आदि भाषाओं के भी ज्ञाता थे।


तदंतर स्वामी विवेकानंद ने 'रामकृष्ण मिशन' की स्थापना की और इसकी शाखाएं देशभर में खोल दीं। इस संस्था का उद्देश्य लोकसेवा करते हुए वेदांत को लोकप्रिय करना था।


फिर एक दिन 4 जुलाई, 1902 को वे एकाएक समाधि में लीन हो गए। कहा जाता है कि उसी अवस्था में वह शरीर त्यागकर स्वर्ग सिधार गए। कन्याकुमारी में समुद्र के मध्य बना 'विवेकानंद स्मारक' उनकी स्मृति को जीवित रखे है वे ज्ञान की ऐसी ज्योत प्रज्वलित कर गए हैं, जो संसार को सदैव मार्गदर्शन करती रहेगी। स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं को अपना कर हम वर्तमान भारतवर्ष को भ्रष्टाचार मुक्त कर सकते हैं।

रानी लक्ष्मीबाई हिन्दी निबंध

  रानी लक्ष्मीबाई


भारत की वीरांगनाओं में रानी लक्ष्मीबाई प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की महान सेनापति थीं। इनका बाल्यकालीन नाम मनुबाई था। इनका जन्म 19 नवंबर, 1835 को वाराणसी में हुआ था। झांसी के राजा गंगाधर राव के साथ शादी के पश्चात् उनका नाम लक्ष्मीबाई पड़ा। लक्ष्मीबाई के पिता ब्राह्मण थे। उनकी मां शौर्यवान व धार्मिक थीं। रानी की मां उन्हें महज 4 वर्ष की उम्र में ही छोड़कर देवलोक चली गई थीं।


रानी लक्ष्मीबाई ने बचपन में ही घुड़सवारी, तलवार और बंदूक चलाना सीख लिया था। विवाह के बाद सन् 1851 में रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया, किंतु दुर्भाग्यवश वह काल कलवित हो गया। उस समय उसकी उम्र मात्र 4 माह की थी। फिर रानी ने एक पुत्र को गोद लिया। उन्होंने उस दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा। किंतु अंग्रेजों को यह ठीक नहीं लगा कि रानी लक्ष्मीबाई का दत्तक पुत्र दामोदर राव उनके सिंहासन का कानूनी वारिस बने। क्योंकि झांसी पर अंग्रेज स्वयं शासन करना चाहते थे। अतः अंग्रेजों ने कहा कि झांसी पर से रानी लक्ष्मीबाई का अधिकार खत्म हो जाएगा, क्योंकि उनके पति महाराजा गंगाधर का कोई वारिस नहीं है। फिर अंग्रेजों ने झांसी को अपने राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी। इसी बात पर अंग्रेजों और रानी के मध्य युद्ध छिड़ गया।


रानी लक्ष्मीबाई झांसी छोड़ने को तैयार नहीं थीं। वह देशभक्ति और स्वाभिमान की प्रतीक थीं। इसी मध्य सन् 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम आरंभ हो गया। रानी लक्ष्मीबाई युद्ध-विद्या में निपुण थीं। वह पूरे शहर को स्वयं देख रही थीं। रानी ने पुरुषों की वेशभूषा पहनी हुई थी। बच्चा उनकी पीठ पर बंधा हुआ था। रानी ने घोड़े की लगाम मुंह से थामी हुई थी और उनके दोनों हाथों में तलवारें थीं। उन्होंने अंग्रेजों के समक्ष कभी आत्म-समर्पण नहीं किया और अंग्रेजों को भरपूर टक्कर दी।


दूसरे राजाओं ने उनका साथ नहीं दिया। इस कारण वे हार गईं और अंग्रेजों ने झांसी पर कब्जा कर लिया। इसके बाद काल्पी जाकर उन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा। नाना साहब और तांत्या टोपे के साथ मिलकर रानी ने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए।


महारानी लक्ष्मीबाई घुड़सवार की पोशाक में लड़ते-लड़ते 17 जून, 1858


को शहीद हो गईं। यदि जिवाजी राव सिंधिया ने रानी लक्ष्मीबाई से कपट न किया होता तो भारत 100 वर्ष पूर्व 1857 में ही अंग्रेजों के आधिपत्य से मुक्त हो गया होता। प्रत्येक भारतीय को उनकी वीरता सदैव याद रहेगी। कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने उनकी वीरता के विषय में बहुत बढ़िया लिखा है:


'बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।'

१४ सितम्बर – हिन्दी दिवस

  १४ सितम्बर – हिन्दी दिवस हिन्दुस्थानी है हम , गर्व करो हिन्दी पर सम्मान देना , दिलाना कर्तव्य है हम पर खत्म हुआ विदेशी शासन , अब तोड...